Friday, July 14, 2023

अभंग

 इयत्ता सातवीच्या विद्यार्थ्यांसाठी विचार मंथन करिता तुकाराम महाराजांचा अभंग 

||वृक्षवल्ली आम्हा सोयरे वनचरे||

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वृक्षवल्ली आम्हा सोयरी वनचरे। 

पक्षी ही सुस्वरे आळविती।। धृ || 

येण सुखे रुचे एकांताचा वास ।

 नाही गुणदोष अंगा येत ।। 1 ।। 

आकाश मंडप पृथिवी आसन । 

रमे तेथे मन क्रिडा करी।। 2 ।। 

कंथा, कमंडलू देह उपचारा, 

जाणवितो वारा अवसरु।। 3

हरिकथा भोजन परवडी विस्तार।

 करोनि प्रकार सेवु रुची ।। 4 ।। 

तुका म्हणे होय मनासी संवादु । 

आपलासी वाद आपणासी ।। 5 ।।


शब्दार्थ - इस अभंग में तुकाराम जी कहते हैं कि इस जंगल के पेड़, पौधे और वनचर ही मेरे रिश्तेदार हैं। जहाँ पंछी भी में सुस्वर में भगवान का कीर्तन करते हैं ।। धृ


इनके साथ रहते हुये भी मुझे एकांत का आनंद मिल रहा है और इनके गुण दोष मुझमें नहीं आते।। 1 ।।


यहाँ आकाश का मंडप (आच्छादन) है और जमीं ही आसन है। ऐसे वातावरण में मेरा मन भगवत संकीर्तन का आनंद लेता है  ।। 2 ।। 

हरि कथा ही मेरा भोजन है और उसका अनेक प्रकार से विस्तार ही विविध पदार्थ बनाकर आनंदपूर्वक सेवन कर रहा हूँ ।।311


 अपने ही मन पर कार्य करते हुये मेरे मन के भ्रमों को मैं तोड़ता हूँ ।। 4 ।। 

बैठने के लिये आसन और मेरा कमंडल मेरे देह की जरूरतों के लिये पर्याप्त है और यह बहती हुई हवायें ही सिर्फ समय का भान देती हैं।। 5 ।।


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